Physiotherapy: भारत में एक उभरता करियर और स्वास्थ्य सेवा का भविष्य
मंगलायतन यूनिवर्सिटी, जबलपुर के फैकल्टी ऑफ मेडिकल एंड एलाइड हेल्थ साइंस के डीन एवं प्रोफेसर डॉ. पी. कुमार से विशेष साक्षात्कार


विकास कुरील
Physiotherapy/Physiotherapist: भारतीय स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में फिजियोथेरेपी एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। जहाँ एक ओर यह विधा दशकों पुरानी है, वहीं दूसरी ओर इसकी वास्तविक क्षमता का उपयोग अभी भी पूरी तरह नहीं हो पाया है। इस महत्वपूर्ण विषय पर गहन चर्चा के लिए हमने मंगलायतन यूनिवर्सिटी, जबलपुर के फैकल्टी ऑफ मेडिकल एंड एलाइड हेल्थ साइंस के डीन एवं प्रोफेसर डॉ. पी. कुमार से विशेष साक्षात्कार किया। 16 वर्षों से अधिक के अनुभव और SVNIRTAR से BPT, MPT की शिक्षा प्राप्त डॉ. कुमार वर्तमान में पीएचडी स्कॉलर हैं। इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजियोथेरेपिस्ट के सदस्य और IAP जबलपुर शाखा के संस्थापक संयोजक के रूप में उन्होंने इस क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

डीन एवं प्रोफेसर, फैकल्टी ऑफ मेडिकल एंड एलाइड हेल्थ साइंस, मंगलायतन यूनिवर्सिटी, जबलपुर, मध्य प्रदेश
-सीनियर कंसल्टेंट, बेस्ट सुपर स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल, जबलपुर
-सदस्य, इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजियोथेरेपिस्ट (IAP)
-संस्थापक संयोजक, IAP जबलपुर शाखा
-सदस्य, बोर्ड ऑफ स्टडी, MPMSU
सर्टिफिकेट से पीएचडी तक का सफर (Physiotherapy/Physiotherapist)
डॉ. कुमार बताते हैं कि फिजियोथेरेपी की शुरुआत भारत में काफी पहले हुई थी, लेकिन उस समय यह केवल सर्टिफिकेट कोर्स के रूप में उपलब्ध था। उस दौर में फिजियोथेरेपिस्ट को मुख्य रूप से ऑर्थोपेडिक विभाग में सहायक के रूप में नियुक्त किया जाता था। जॉइंट स्टिफनेस, मांसपेशियों की कमजोरी और मोबिलिटी बढ़ाने जैसे बुनियादी कार्यों के लिए इसका उपयोग होता था। आज का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। फिजियोथेरेपी अब साढ़े चार साल का व्यापक स्नातक कार्यक्रम है, जिसमें चार साल की शैक्षणिक शिक्षा और छह महीने की अनिवार्य इंटर्नशिप शामिल है। इसके बाद विभिन्न विशेषज्ञताओं में दो साल का मास्टर कार्यक्रम उपलब्ध है – ऑर्थोपेडिक्स, न्यूरोलॉजी, कार्डियो-पल्मोनरी, पीडियाट्रिक्स, जेरियाट्रिक्स, स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपी और अन्य विशेषज्ञताओं में। इसके अलावा, देश-विदेश में पीएचडी के अवसर भी उपलब्ध हैं।
भारत बनाम विदेश: अंतर की खाई (Physiotherapy/Physiotherapist)
जब भारत और विकसित देशों में फिजियोथेरेपी की स्थिति की तुलना की जाती है, तो कई महत्वपूर्ण अंतर सामने आते हैं। डॉ. कुमार के अनुसार, भारत में सबसे बड़ी समस्या जागरूकता की कमी है। बड़े-बड़े अस्पतालों में भी फिजियोथेरेपी विभाग को जितना महत्व मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल पाता। स्टाफ की भारी कमी है और प्रति मरीज बहुत कम समय दिया जा पाता है। लोगों को यह पता ही नहीं है कि फिजियोथेरेपी का उपयोग कहाँ-कहाँ किया जा सकता है। भारत में एक फिजियोथेरेपिस्ट को प्रतिदिन 40-50 या उससे भी अधिक मरीज देखने पड़ते हैं, जिसका मतलब है प्रति मरीज केवल 10-15 मिनट। विदेशों में, एक फिजियोथेरेपिस्ट एक मरीज को 45-60 मिनट का समय देता है और दिन में केवल 8-10 मरीज ही देखता है। इसके अलावा, बीमा कवरेज की कमी, पर्याप्त बुनियादी ढांचे का अभाव, और वेतन संरचना में असमानता जैसी समस्याएं भी हैं।
राष्ट्रीय परिषद का अभाव: एक बड़ी खामी | Physiotherapy/Physiotherapist
फिजियोथेरेपी के पिछड़ने का सबसे महत्वपूर्ण कारण डॉ. कुमार राष्ट्रीय नियामक परिषद के अभाव को बताते हैं। जहाँ MBBS के लिए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, आयुर्वेद के लिए AYUSH मंत्रालय, नर्सिंग के लिए इंडियन नर्सिंग काउंसिल, और ऑक्यूपेशनल थेरेपी जैसे क्षेत्रों के लिए रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया है, वहीं फिजियोथेरेपी की अपनी कोई उचित राष्ट्रीय परिषद नहीं थी। इसके कारण बहुत से संस्थान खुल गए जो मानकों को पूरा नहीं करते थे। उचित दिशा-निर्देशों के अभाव में इस क्षेत्र का स्कोप कम हुआ। यह विरोधाभासी है कि ऑक्यूपेशनल थेरेपी, जो फिजियोथेरेपी के बाद शुरू हुई, RCI के तहत स्पष्ट नियमन के कारण कई क्षेत्रों में आगे निकल गई। हालांकि, 2021 में नेशनल कमीशन फॉर एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशंस का गठन एक ऐतिहासिक कदम है। डॉ. कुमार आशावादी हैं कि जैसे-जैसे यह आयोग पूर्णतः लागू होगा, फिजियोथेरेपी में क्रांतिकारी सुधार होंगे।
खेल में शानदार सफलता | Physiotherapy/Physiotherapist
एक क्षेत्र जहाँ फिजियोथेरेपी ने उल्लेखनीय प्रगति की है, वह है स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपी। 1990 और 2000 के दशक तक भारतीय क्रिकेट टीम और ओलंपिक एथलीट विदेशी फिजियोथेरेपिस्ट पर निर्भर थे। आज, भारत के अपने फिजियोथेरेपिस्ट न केवल राष्ट्रीय टीमों के साथ काम कर रहे हैं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता प्राप्त कर रहे हैं। स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपी की सफलता साबित करती है कि उचित प्रशिक्षण, संसाधन और मान्यता मिलने पर भारतीय फिजियोथेरेपिस्ट विश्व स्तरीय सेवा प्रदान कर सकते हैं। IPL और अन्य खेल लीगों में भारतीय फिजियोथेरेपिस्ट की व्यापक उपस्थिति इसका प्रमाण है।
बिना फिजियोथेरेपिस्ट के सर्जरी की सफलता नहीं | Physiotherapy/Physiotherapist
डॉ. कुमार कहते हैं कि चिकित्सा जगत में एक बात स्थापित हो चुकी है – बिना फिजियोथेरेपिस्ट के सर्जरी की सफलता संभव नहीं है। वास्तव में, यह केवल सर्जरी तक सीमित नहीं है, बल्कि चिकित्सा के लगभग हर विभाग में फिजियोथेरेपी की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऑर्थोपेडिक्स में फ्रोजन शोल्डर, ऑस्टियोआर्थराइटिस, और सर्जरी से पहले तथा बाद की देखभाल में फिजियोथेरेपी के उत्कृष्ट परिणाम मिलते हैं। 80-90% मामलों में यह सर्जरी से बचा सकती है। न्यूरोलॉजी में स्ट्रोक के मरीजों के लिए पुनर्वास प्रोटोकॉल अनिवार्य है। स्ट्रोक के मरीज के लिए रिहैब प्रोटोकॉल के बिना चलना संभव नहीं है। आधुनिक तकनीकों में रोबोटिक फिजियोथेरेपी भी आ चुकी है, हालांकि इसकी उच्च लागत के कारण भारत में यह सर्वसुलभ नहीं है। अधिक निवेश का मतलब मरीज के लिए अधिक खर्च होता है, जो सभी के लिए वहनीय नहीं।
कार्डियो-पल्मोनरी विभाग में हार्ट अटैक और बाईपास सर्जरी के बाद पुनर्वास से पुनः हार्ट अटैक का जोखिम 30-40% तक कम हो जाता है। COVID-19 के बाद फेफड़ों की क्षमता बहाली में भी फिजियोथेरेपी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। प्रसूति एवं स्त्री रोग में गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद पीठ दर्द, पेल्विक फ्लोर डिसफंक्शन, और मूत्र असंयम जैसी समस्याओं का समाधान फिजियोथेरेपी से संभव है। डॉ. कुमार विशेष रूप से इस क्षेत्र पर जोर देते हैं क्योंकि भारत में इसके बारे में बहुत कम जागरूकता है। पीडियाट्रिक्स में सेरेब्रल पाल्सी, डाउन सिंड्रोम, और विकासात्मक विलंब वाले बच्चों के लिए प्रारंभिक हस्तक्षेप और फिजियोथेरेपी जीवन बदल सकती है। बच्चों को उचित तकनीक, उपयुक्त स्थान और सही दृष्टिकोण मिलना चाहिए। जेरियाट्रिक्स में बुजुर्गों के लिए गिरने की रोकथाम, संतुलन प्रशिक्षण, और गतिशीलता बनाए रखना फिजियोथेरेपी के प्रमुख क्षेत्र हैं।
नया युग: डॉक्टर की उपाधि और स्वतंत्र प्रैक्टिस | Physiotherapy/Physiotherapist
आने वाले छात्रों के लिए डॉ. कुमार का संदेश अत्यंत उत्साहजनक है। नए नियमों के तहत अब फिजियोथेरेपिस्ट को ‘डॉक्टर’ की उपाधि लगाने की अनुमति मिल चुकी है। पहले कहा जाता था कि फिजियोथेरेपिस्ट डॉक्टर नहीं लगा सकते, लेकिन नया नियम पास हुआ है, उसमें डॉक्टर लिखने की अनुमति प्राप्त हो चुकी है। इसके साथ ही, फिजियोथेरेपिस्ट अब स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस कर सकते हैं। मरीज बिना डॉक्टर के रेफरल के सीधे फिजियोथेरेपिस्ट के पास जा सकते हैं। यह प्रथम संपर्क चिकित्सक के रूप में मान्यता का संकेत है। यह केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि पेशे की मान्यता का प्रतीक है। इससे सामाजिक स्वीकृति, पेशेवर मान्यता, मरीज का विश्वास, और करियर संतुष्टि में वृद्धि होगी।
भविष्य की संभावनाएं | Physiotherapy/Physiotherapist
डॉ. कुमार का मानना है कि आने वाले समय में फिजियोथेरेपी का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। कई कारक इस आशावाद को समर्थन देते हैं। वृद्धावस्था जनसंख्या में वृद्धि, जीवनशैली रोगों में तेजी से वृद्धि, स्वास्थ्य और फिटनेस के प्रति बढ़ती जागरूकता, और खेल उद्योग के विस्तार के कारण फिजियोथेरेपिस्ट की मांग लगातार बढ़ रही है। तकनीकी प्रगति के क्षेत्र में टेली-फिजियोथेरेपी और डिजिटल स्वास्थ्य, रोबोटिक्स और वर्चुअल रियलिटी, AI-आधारित आकलन उपकरण, और पहनने योग्य स्वास्थ्य उपकरण नए अवसर प्रदान कर रहे हैं। नीतिगत समर्थन के रूप में नेशनल कमीशन का गठन, डॉक्टर की उपाधि की मान्यता, स्वतंत्र प्रैक्टिस का अधिकार, और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं में संभावित समावेश भी सकारात्मक संकेत हैं।
करियर के विविध अवसर | Physiotherapy/Physiotherapist
फिजियोथेरेपी में करियर के अनेक अवसर उपलब्ध हैं। पारंपरिक क्षेत्रों में सरकारी और निजी अस्पताल, पुनर्वास केंद्र, खेल संस्थान, और शैक्षणिक संस्थान शामिल हैं। उभरते क्षेत्रों में कॉर्पोरेट वेलनेस कार्यक्रम, होम-केयर सेवाएं, निजी प्रैक्टिस और क्लिनिक चेन, टेली-हेल्थ और ऑनलाइन परामर्श, फिटनेस उद्योग, और वृद्धाश्रम में काम के अवसर हैं। वेतन की बात करें तो प्रारंभिक करियर में 20,000-40,000 रुपये प्रति माह, मध्य करियर में 50,000 से 1,00,000 रुपये प्रति माह, और वरिष्ठ स्तर पर 1,00,000 से 5,00,000 रुपये या उससे अधिक प्रति माह कमाई की संभावना है। निजी प्रैक्टिस में आय की कोई सीमा नहीं है।

युवाओं के लिए मार्गदर्शन | Physiotherapy/Physiotherapist
डॉ. कुमार युवाओं को सलाह देते हैं कि यदि वे लोगों की सेवा करना चाहते हैं, विज्ञान और स्वास्थ्य में रुचि रखते हैं, सार्थक और सम्मानजनक करियर चाहते हैं, और निरंतर सीखने के लिए तैयार हैं, तो फिजियोथेरेपी उनके लिए एक आदर्श विकल्प हो सकता है। प्रवेश के लिए 12वीं कक्षा में भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के साथ न्यूनतम 50-60% अंक आवश्यक हैं। AIIMS, SVNIRTAR, CMC Vellore, Manipal Academy, और राज्य सरकार के मेडिकल कॉलेज जैसे प्रमुख संस्थानों में प्रवेश के लिए प्रतिस्पर्धी परीक्षाएं होती हैं। सफलता के लिए मजबूत आधार बनाना, व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करना, विशेषज्ञता चुनना, सतत शिक्षा और प्रशिक्षण, नेटवर्किंग, और तकनीकी दक्षता महत्वपूर्ण हैं।
संघर्ष से सफलता की ओर | Physiotherapy/Physiotherapist
फिजियोथेरेपी भारत में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। दशकों के संघर्ष, अनदेखी और चुनौतियों के बाद, यह क्षेत्र आखिरकार अपनी उचित मान्यता और स्थान प्राप्त कर रहा है। जागरूकता की कमी, संसाधनों की कमी, और नीतिगत चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं, लेकिन भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल है। बढ़ती मांग, तकनीकी प्रगति, और संस्थागत समर्थन के साथ, फिजियोथेरेपी जल्द ही भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का एक अनिवार्य अंग बन जाएगी। डॉ. कुमार का संदेश स्पष्ट है – यह सही समय है इस क्षेत्र में प्रवेश करने का। जैसे-जैसे नेशनल कमीशन पूर्ण रूप से लागू होगा, पेशे में और भी सुधार होंगे। नए कानून, बेहतर मान्यता, और बढ़ते अवसरों के साथ, फिजियोथेरेपिस्ट न केवल एक सम्मानजनक करियर बना सकते हैं, बल्कि समाज में वास्तविक बदलाव भी ला सकते हैं। फिजियोथेरेपी केवल एक पेशा नहीं है, यह जीवन बदलने का माध्यम है। जब एक स्ट्रोक का मरीज फिर से चलना सीखता है, जब एक खिलाड़ी चोट के बाद मैदान में लौटता है, जब एक बुजुर्ग व्यक्ति दर्द-मुक्त जीवन जीता है, जब एक बच्चा अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुंचता है – इन सभी सफलताओं के पीछे फिजियोथेरेपिस्ट का योगदान होता है।




