स्ट्रोक, सर्वाइकल और सियाटिका को न करें नजरअंदाज, न्यूरो फिजियोथेरेपी से कैसे लौट सकती है शरीर की ताकत?

लखनऊ/अभिषेक पाण्डेय: गर्दन में दर्द, कमर में खिंचाव, हाथ-पैर में झुनझुनी या चलते समय संतुलन बिगड़ना… शरीर में होने वाले इन बदलावों को अक्सर लोग थकान या सामान्य परेशानी समझकर टाल देते हैं। लेकिन लगातार बने रहने वाले ऐसे लक्षण किसी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकते हैं। खासकर तब, जब दर्द के साथ सुन्नपन, मांसपेशियों में कमजोरी या चलने-फिरने में परेशानी होने लगे। बदलती जीवनशैली ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। घंटों मोबाइल चलाना, लैपटॉप पर काम करना और शारीरिक गतिविधियों से दूरी बनाने के कारण युवाओं में सर्वाइकल, बैक पेन, सियाटिका और नसों पर दबाव जैसी समस्याएं देखने को मिल रही हैं।
वहीं स्ट्रोक और पार्किंसन जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों में मरीज की खोई हुई शारीरिक क्षमता वापस लाने के लिए न्यूरो फिजियोथेरेपी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आखिर न्यूरो फिजियोथेरेपी कैसे काम करती है? स्ट्रोक के बाद मरीज को कब से एक्सरसाइज करानी चाहिए? क्या पार्किंसन में चलने-फिरने की क्षमता बनाए रखना संभव है? और क्या गलत पोस्चर युवाओं की नसों और रीढ़ को प्रभावित कर रहा है? इन सवालों पर डॉ. एफए खान, विशेषज्ञ न्यूरो एवं मस्कुलर डिसऑर्डर, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ से विशेष बातचीत में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आईं।

क्या है न्यूरो फिजियोथेरेपी, कैसे करती है शरीर को दोबारा सक्रिय? | What is Neuro-physiotherapy
आमतौर पर फिजियोथेरेपी को लोग कमर दर्द, घुटनों के दर्द या मांसपेशियों की अकड़न से राहत पाने का तरीका मानते हैं। हालांकि न्यूरो फिजियोथेरेपी का दायरा इससे कहीं व्यापक है। यह मस्तिष्क, स्पाइनल कॉर्ड और नर्वस सिस्टम से जुड़ी समस्याओं के कारण प्रभावित हुई शारीरिक गतिविधियों को बेहतर बनाने पर केंद्रित होती है। डॉ. खान के मुताबिक, स्ट्रोक, पैरालिसिस, नसों से जुड़ी समस्याओं, शरीर में सुन्नपन, सेंसेशन में बदलाव और मांसपेशियों की कमजोरी जैसी स्थितियों में न्यूरो फिजियोथेरेपी की जरूरत पड़ सकती है। इसका उद्देश्य केवल दर्द कम करना नहीं, बल्कि मरीज की मूवमेंट, मांसपेशियों की ताकत, संतुलन और चलने-फिरने की क्षमता में सुधार लाना है, ताकि वह दैनिक गतिविधियों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय अधिक आत्मनिर्भर बन सके।
स्ट्रोक के बाद फिजियोथेरेपी में देरी क्यों पड़ सकती है भारी? | Stroke and Neuro-physiotherapy
स्ट्रोक के बाद मरीज के शरीर का एक हिस्सा कमजोर या निष्क्रिय हो सकता है। कई बार मरीज बिस्तर से उठने, बैठने, हाथ-पैर हिलाने और चलने तक में असमर्थ हो जाता है। ऐसे समय परिवार का पूरा ध्यान दवाओं और अस्पताल में चल रहे उपचार पर रहता है, जबकि पुनर्वास की प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। डॉ. खान बताते हैं कि स्ट्रोक के बाद मरीज की चिकित्सकीय स्थिति स्थिर होने पर जल्द से जल्द रिहेबिलिटेशन शुरू करना चाहिए। कई मरीजों में शुरुआती 24 से 48 घंटे के भीतर नियंत्रित मोबिलाइजेशन शुरू किया जा सकता है। हालांकि इसका निर्णय मरीज की स्थिति और विशेषज्ञों के मूल्यांकन के आधार पर ही होना चाहिए। शुरुआती चरण में प्रभावित हाथ-पैरों की सुरक्षित मूवमेंट, मांसपेशियों को सक्रिय रखना और धीरे-धीरे शारीरिक गतिविधियों की क्षमता विकसित करना प्रमुख लक्ष्य होता है। लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहने से शारीरिक निष्क्रियता बढ़ सकती है। इसलिए स्ट्रोक के उपचार में दवाओं के साथ सही समय पर पुनर्वास की योजना बनाना भी जरूरी है।
स्ट्रोक रिकवरी के पहले 3 से 6 महीने क्यों माने जाते हैं अहम? | Stroke, Symptoms and Recovery
स्ट्रोक के बाद शुरुआती तीन से छह महीने रिकवरी के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इस दौरान नियमित फिजियोथेरेपी और अभ्यास से मरीज की शारीरिक क्षमता में सुधार की संभावनाओं का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि छह महीने बाद रिकवरी रुक जाती है। मरीज की उम्र, स्ट्रोक की गंभीरता, प्रभावित हिस्से और पुनर्वास की निरंतरता के अनुसार सुधार की प्रक्रिया आगे भी जारी रह सकती है। डॉ. खान के अनुसार, सबसे बड़ी चुनौती जागरूकता की कमी है। कई परिवारों को यह जानकारी ही नहीं होती कि स्ट्रोक के बाद फिजियोथेरेपी कब और क्यों जरूरी है। परिणामस्वरूप मरीज के पुनर्वास में देरी हो जाती है।

मोबाइल और लैपटॉप के बीच फंस रहा युवाओं का शरीर, बढ़ रही सर्वाइकल और सियाटिका की समस्या | Youth and Health Problems
डिजिटल वर्क कल्चर ने काम को आसान बनाया है, लेकिन शरीर की गतिविधियों को सीमित भी कर दिया है। लंबे समय तक एक ही जगह बैठकर काम करना, मोबाइल पर गर्दन झुकाकर स्क्रॉलिंग करना और शारीरिक व्यायाम से दूरी बनाना अब स्वास्थ्य के लिए चुनौती बन रहा है। डॉ. खान के मुताबिक, युवाओं में पोस्टुरल बैक पेन, सर्वाइकल, सियाटिका, डिस्क बल्जिंग और नर्व कंप्रेशन जैसी समस्याएं देखने को मिल रही हैं। इन समस्याओं में गर्दन या कमर का दर्द कभी-कभी हाथ या पैर तक फैल सकता है। कुछ लोगों को झुनझुनी, सुन्नपन या मूवमेंट में परेशानी भी महसूस होती है। समस्या यह है कि शुरुआती लक्षणों को अक्सर सामान्य थकान समझ लिया जाता है। दर्द होने पर पेनकिलर लेकर दोबारा उसी दिनचर्या में लौट जाना समस्या के कारण को दूर नहीं करता। डॉ. खान का कहना है कि लंबे समय तक गलत पोस्चर, कमजोर मांसपेशियां और अचानक भारी वजन उठाना शरीर पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं। इसलिए दर्द का कारण समझना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से जांच कराना जरूरी है।

पार्किंसन में फिजियोथेरेपी क्यों है जरूरी? चलने और संतुलन में मिल सकती है मदद | Physiotherapy for Parkinson’s
पार्किंसन एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें मरीज की शारीरिक गतिविधियां धीरे-धीरे प्रभावित हो सकती हैं। चलने की गति कम होना, शरीर में अकड़न, संतुलन बिगड़ना और उठने-बैठने में परेशानी इसके प्रमुख प्रभावों में शामिल हैं। ऐसी स्थिति में न्यूरो फिजियोथेरेपी मरीज की कार्यक्षमता बनाए रखने में मदद कर सकती है। डॉ. खान के अनुसार, पार्किंसन के मरीजों के लिए मसल्स स्ट्रेंथनिंग, बैलेंस ट्रेनिंग, गेट ट्रेनिंग और मूवमेंट एक्सरसाइज उपयोगी हो सकती हैं। इनका उद्देश्य मरीज को अधिक समय तक सक्रिय रखना और दैनिक गतिविधियों में उसकी स्वतंत्रता बनाए रखने में सहयोग करना है। मरीज की स्थिति के अनुसार नियमित और सुरक्षित अभ्यास की योजना बनाना जरूरी है।
मरीज की मदद करते–करते कहीं उसकी आत्मनिर्भरता तो नहीं छीन रहा परिवार? | Physiotherapy for Parkinson’s
बीमारी के बाद परिवार का सहयोग मरीज की रिकवरी में अहम होता है। लेकिन कई बार जरूरत से ज्यादा देखभाल मरीज की बची हुई शारीरिक क्षमता के इस्तेमाल को सीमित कर सकती है। डॉ. खान बताते हैं कि कई परिवार मरीज को खुद हाथ उठाने, पैर चलाने, बैठने या खाना खाने का अवसर देने के बजाय हर काम स्वयं करने लगते हैं। जबकि मरीज जितनी गतिविधियां सुरक्षित रूप से खुद कर सकता है, उसे उनका अभ्यास करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे उसकी सक्रियता और आत्मनिर्भरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। परिवार को यह समझना होगा कि मरीज की सहायता करना और उसे पूरी तरह दूसरों पर निर्भर बना देना, दोनों अलग बातें हैं। हालांकि किसी भी गतिविधि में जोखिम होने पर फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह जरूरी है।

AI और रोबोटिक फिजियोथेरेपी से बदल रहा न्यूरो रिहेबिलिटेशन का तरीका | AI and Physiotherapy
मेडिकल टेक्नोलॉजी के विस्तार के साथ न्यूरो फिजियोथेरेपी में भी नए विकल्प सामने आ रहे हैं। रोबोटिक गेट ट्रेनिंग, रोबोटिक ग्लव्स, वर्चुअल रियलिटी और AI आधारित मूवमेंट एनालिसिस मरीजों के पुनर्वास में सहायक बन रहे हैं। डॉ. खान के अनुसार, रोबोटिक सिस्टम चलने में परेशानी वाले मरीजों को नियंत्रित तरीके से अभ्यास कराने में मदद कर सकते हैं। वहीं AI आधारित कैमरे और सॉफ्टवेयर शरीर की गतिविधियों, मूवमेंट के एंगल और पैटर्न का विश्लेषण करने में उपयोगी हो सकते हैं। वर्चुअल रियलिटी आधारित एक्सरसाइज के जरिए बैलेंस और कोऑर्डिनेशन का अभ्यास भी कराया जा सकता है। हालांकि इन तकनीकों को विशेषज्ञ की जगह लेने वाला विकल्प नहीं माना जा सकता। मरीज की स्थिति के अनुसार एक्सरसाइज तय करना और उपचार में बदलाव करना प्रशिक्षित विशेषज्ञ की जिम्मेदारी है।

दिनभर की दिनचर्या में छोटे बदलाव जरूरी हैं… | Lifestyle Changes
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– लंबे समय तक लगातार एक ही पोस्चर में न बैठें।
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– नियमित वॉक और हल्की स्ट्रेचिंग करें।
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– मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली एक्सरसाइज अपनाएं।
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– काम के बीच छोटे मूवमेंट ब्रेक लें।
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– पर्याप्त नींद और शारीरिक सक्रियता बनाए रखें।


