Air Pollution: दिल्ली की हवा हो गई जहरीली! खराब होती एक्यूआई के बीच अलर्ट


Air Pollution: दिवाली की रौनक अभी पूरी तरह छाई भी नहीं है कि दिल्ली की हवा ने लोगों की चिंता बढ़ानी शुरू कर दी है। पिछले कई वर्षों से देखा जाता रहा है कि त्योहार से पहले ही राजधानी में वायु प्रदूषण का खतरा मंडराने लगा है। बदलता मौसम, तापमान में गिरावट के साथ हवा की धीमी रफ्तार और प्रदूषण फैलाने वाले कारक मिलकर दिल्ली-एनसीआर की हवा को जहरीला बना देते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, दिवाली के दौरान जलने वाले पटाखे और पड़ोसी राज्यों में पराली जलने से प्रदूषण का स्तर और भी बढ़ जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, प्रदूषण के कारण सबसे ज्यादा चिंता बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों की है। इन्हीं जोखिमों को देखते हुए सभी लोगों को अभी से सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है। डॉक्टर कह रहे हैं खतरे को देखते हुए सभी लोग प्रदूषण के शुरुआती संकेतों को गंभीरता से लें और अपनी सेहत की सुरक्षा के लिए जरूरी सावधानियां बरतें।
खराब होती एक्यूआई के बीच डॉक्टर का अलर्ट
दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) अब गंभीर से बेहद गंभीर श्रेणी में पहुंच गया है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है और लोगों की सेहत के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। इसका सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को है, जिन्हें पहले से सांस या दिल की क्रॉनिक बीमारी है। छोटे बच्चों और बुजुर्गों को प्रदूषण के खतरों को लेकर और भी अलर्ट रहना जरूरी है। हर साल जब एक्यूआई गंभीर स्तर पर पहुंचता है, तो अस्पतालों के इमरजेंसी विभाग में सांस की परेशानी और लगातार खांसी की शिकायत वाले मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। इनमें से कई मरीजों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है, जबकि कुछ की हालत इतनी गंभीर हो जाती है कि उन्हें आईसीयू तक की जरूरत हो सकती है।
बढ़ सकती है सांस और एलर्जी की दिक्कतें
जब हवा में प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तो इसका असर केवल पहले से बीमार लोगों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि स्वस्थ लोग भी इसकी चपेट में आने लगते हैं। कई मामलों में बिल्कुल स्वस्थ लोगों में भी सीने में जकड़न, सांस फूलने, आंखों से पानी आने और खांसी जैसी परेशानियां होने लगती हैं। जिन लोगों को सीओपीडी, अस्थमा या दिल की बीमारी है, उनकी परेशानी और बढ़ सकती है। सीओपीडी फेफड़ों की एक ऐसी बीमारी है, जिसमें सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं और मरीज को सांस लेने में लगातार दिक्कत होती है। वहीं, अस्थमा में सांस की नलियों में सूजन आ जाती है, जिससे सांस लेने में परेशानी होती है। प्रदूषित हवा फेफड़ों और शरीर में खून की नसों में सूजन बढ़ा देती है। इससे पहले से मौजूद बीमारियां गंभीर हो सकती हैं और शरीर में ऑक्सीजन सैचुरेशन लो हो सकता है। मरीज को पहले से ज्यादा सांस फूलने की समस्या होने लगती है।
आखिर दिल्ली में इतना प्रदूषण क्यों बढ़ रहा है?
वायु प्रदूषण बढ़ने के पीछे दो बड़ी वजहें हैं। पहली- प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियां और दूसरी है मौसम की परिस्थितियां। भारत का इंडो गंगेटिक प्लेन इलाका चारों तरफ से जमीन से घिरा हुआ है। सर्दियों में यहां तापमान गिरने के कारण ठंडी हवा जमीन के आसपास ही बनी रहती है। हवा की रफ्तार भी काफी कम हो जाती है। ऐसे में प्रदूषण के कण ऊपर नहीं जा पाते और न ही हवा के साथ दूसरी जगहों पर फैल पाते हैं। वे जमीन के आसपास जमा होते रहते हैं। यही वजह है कि दिल्ली जैसे शहरों में सर्दियों के दौरान प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ जाता है। दूसरी तरफ, इंसानी गतिविधियां भी प्रदूषण बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। खेतों में पराली जलाना, डीजल का ज्यादा इस्तेमाल, सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या और पटाखे जलाना हवा को और जहरीला बनाते हैं। डीजल जनरेटर और दूसरे उपकरणों से निकलने वाला धुआं तथा निर्माण कार्यों के दौरान उड़ने वाली धूल भी प्रदूषण बढ़ाती है।
फिर प्रदूषण के खतरे को कम कैसे करें?
इस समस्या से निपटने के लिए कोई एक उपाय काफी नहीं है। प्रदूषण फैलाने वाले सभी कारणों पर एक साथ काम करना जरूरी है। पटाखे जलाने पर रोक लगाने और खेतों में पराली जलाने की घटनाओं को कम करने से प्रदूषण को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। वायु प्रदूषण एक साइलेंट किलर है, जो धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाता है और कई बार जानलेवा भी साबित होता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से इंसान की उम्र भी कम हो सकती है। इसका असर बच्चों पर भी बेहद गंभीर होता है। प्रदूषित हवा में सांस लेने से बच्चों के फेफड़ों का विकास प्रभावित हो सकता है। कई अध्ययनों में भी सामने आया है कि प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने से बच्चों के फेफड़ों की काम करने की क्षमता प्रभावित होती है। इसका असर उनके भविष्य के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।





