अच्छे स्वास्थ्य की आधारशिला है ‘स्वच्छ हवा’
सांस के रोगियों के उपचार में आधुनिकता और जागरूकता दोनो की है आवश्यकताः कुलपति

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प्रदूषण से सांस के रोगियों पर दोहरी मारः डॉ. सूर्यकान्त
लखनऊ: किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानन्द ने कहा कि श्वसन रोगों के बढ़ते मामलों के बीच आधुनिक तकनीकों और जनजागरूकता का समन्वय अत्यंत आवश्यक है। आम जनमानस में लक्षणों की समय पर पहचान, प्रदूषण से बचाव और स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूकता भी जरूरी है। कुलपति ने यह बातें ‘रेस्पिवॉक-2026’ के दौरान कहीं। वहीं, रेस्पिवॉक-2026 सम्मेलन में ऑर्गनाइजेशन फॉर कान्सर्नवेशन ऑफ एन्वारन्मेन्ट एण्ड नेचर (ओशन) के अध्यक्ष डॉ. सूर्यकान्त ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सामुदायिक जागरूकता और जन भागीदारी पर विशेष बल दिया।

डॉ. सूर्यकान्त ने कहा, स्वच्छ वायु केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि एक अनिवार्य चिकित्सकीय आवश्यकता बन चुकी है। जिस प्रकार दवाइयाँ और स्वस्थ जीवनशैली जरूरी हैं, उसी प्रकार स्वच्छ हवा भी अच्छे स्वास्थ्य की आधारशिला है। भारत के कई शहर, विशेषकर दिल्ली और लखनऊ, लगातार अत्यधिक वायु प्रदूषण की चपेट में हैं। यहाँ पीएम 2.5 का स्तर सुरक्षित मानकों से कई गुना अधिक है, जिससे हर व्यक्ति अनजाने में विषैली हवा में सांस ले रहा है। इसका सीधा प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
अस्थमा, एलर्जी, खांसी और सांस फूलने के मरीजों की संख्या में हो रही बढ़ोतरी
डॉ. सूर्यकान्त के अनुसार अस्थमा, एलर्जी, लगातार खांसी और सांस फूलने के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। शोध बताते हैं कि प्रदूषित शहरों में बच्चों में अस्थमा का खतरा काफी बढ़ गया है और लगभग हर तीन में से एक बच्चा फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी से प्रभावित हो सकता है। उन्होंने बताया, वायु प्रदूषण केवल फेफड़ों को ही नहीं, बल्कि पूरे शरीर को प्रभावित करता है। सूक्ष्म कण रक्त में मिलकर हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं। यहां तक कि गर्भावस्था में भी इसका प्रभाव भ्रूण के विकास पर पड़ता है। डॉ. सूर्यकान्त ने कहा, समय पर पहचान और रोकथाम बेहद जरूरी है, क्योंकि कई लोग शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं।





