World Mental Health Day: क्या ज्यादा मोबाइल और सोशल मीडिया बिगाड़ रहा है मानसिक सेहत?

World Mental Health Day: आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई, नौकरी, मनोरंजन से लेकर दोस्तों और परिवार से जुड़े रहने तक, ज्यादातर काम स्क्रीन के जरिए होने लगे हैं। लेकिन लगातार नोटिफिकेशन देखना, सोशल मीडिया पर घंटों स्क्रॉल करना और दूसरों की जिंदगी से अपनी तुलना करना मानसिक सेहत पर असर डाल सकता है। कई बार व्यक्ति को इसका एहसास भी नहीं होता और धीरे-धीरे तनाव, चिड़चिड़ापन, बेचैनी और नींद से जुड़ी परेशानियां बढ़ने लगती हैं। इसी को डिजिटल स्ट्रेस के तौर पर समझा जाता है।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के मौके पर यह समझना जरूरी है कि आखिर ज्यादा स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया का इस्तेमाल हमारे दिमाग और व्यवहार को किस तरह प्रभावित कर सकता है। साथ ही, किन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और डिजिटल स्ट्रेस से बचने के लिए रोजमर्रा की जिंदगी में कौन-सी आदतें अपनाई जा सकती हैं।
डिजिटल स्ट्रेस के संकेत
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लगातार मोबाइल चेक करने की इच्छा डिजिटल स्ट्रेस का एक संकेत हो सकती है। अगर फोन पास न होने पर बेचैनी महसूस हो या बार-बार बिना किसी खास वजह के स्क्रीन देखने की आदत बन जाए, तो स्क्रीन टाइम पर ध्यान देना जरूरी है। सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के बाद तनाव, उदासी या अपनी जिंदगी को दूसरों से कमतर समझना भी एक चेतावनी हो सकती है। सोशल मीडिया पर लोग अक्सर अपनी जिंदगी के चुनिंदा अच्छे हिस्से ही दिखाते हैं, जिससे तुलना की भावना बढ़ सकती है।
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नींद का प्रभावित होना भी महत्वपूर्ण संकेत है। देर रात तक मोबाइल चलाना या सोने से ठीक पहले सोशल मीडिया देखना नींद की दिनचर्या को बिगाड़ सकता है। इसके अलावा ध्यान लगाने में परेशानी, काम में मन न लगना, चिड़चिड़ापन और लगातार मानसिक थकान भी ज्यादा डिजिटल इस्तेमाल से जुड़ी हो सकती है।डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें?
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सबसे पहले अपने स्क्रीन टाइम पर नजर रखें। गैरजरूरी नोटिफिकेशन बंद करना और सोशल मीडिया के लिए रोजाना एक निश्चित समय तय करना मददगार हो सकता है।
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सोने से कम से कम 30-60 मिनट पहले मोबाइल और दूसरे स्क्रीन डिवाइस से दूरी बनाने की कोशिश करें। दिन में कुछ समय बिना फोन के बिताएं और इस दौरान टहलना, एक्सरसाइज, किताब पढ़ना या परिवार के साथ समय बिताना बेहतर विकल्प हो सकता है।
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सोशल मीडिया पर दिखने वाली जिंदगी को वास्तविक जिंदगी से तुलना करने से बचें। अगर लगातार तनाव, बेचैनी, उदासी या नींद की समस्या बनी रहती है और रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगते हैं, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।




