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Social Media Impact: युवाओं में हो रही सैटिस्फैक्शन की, वजह है मोबाइल-लैपटॉप की स्क्रीन!

Social Media Impact: मोबाइल हाथ में आते ही उंगलियां अपने आप स्क्रीन पर चलने लगती हैं. रील्स, पोस्ट, स्टोरी एक के बाद एक देखते-देखते घंटों निकल जाते हैं. यह अब सिर्फ टाइमपास नहीं रहा, बल्कि रोजमर्रा की आदत बन चुका है. लेकिन क्या यही आदत धीरे-धीरे युवाओं की खुशी को कम कर रही है? दुनिया भर के आंकड़ों को जोड़कर तैयार की गई एक नई रिपोर्ट इसी ओर इशारा करती है. खास बात यह है कि असर सबसे ज्यादा किशोर लड़कियों में नजर आया है, जो लंबे समय तक सोशल मीडिया पर एक्टिव रहती हैं.

लड़कियों में ज्यादा दिखा असर | Social Media Impact

वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में सामने आया है कि जिन किशोरों, खासकर 15 साल की लड़कियों, का सोशल मीडिया इस्तेमाल ज्यादा है, उनमें लाइफ सैटिस्फैक्शन कम पाया गया. यानी जितना ज्यादा समय स्क्रीन पर, उतनी ही कम संतुष्टि का एहसास. हालांकि सोशल मीडिया और लाइफ सैटिस्फैक्शन में कोई सीधा रिश्ता भले ही न हो, लेकिन ट्रेंड साफ है. जिन युवाओं का सोशल मीडिया यूज सीमित है, वे अपनी जिंदगी को लेकर ज्यादा संतुष्ट महसूस करते हैं, जबकि लंबे समय तक ऑनलाइन रहने वालों में यह स्तर गिरता दिखता है.

आखिर क्या देख रहे हैं ये युवा | Social Media Impact

इसका एक कारण यह भी माना जा रहा है कि सोशल मीडिया पर क्या देखा जा रहा है. लगातार स्क्रॉल होने वाला कंटेंट, एल्गोरिदम से आगे बढ़ाए गए पोस्ट और इन्फ्लुएंसर-टाइप लाइफस्टाइल, यूजर्स पर ज्यादा असर डालते हैं. इसके उलट, जब प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल दोस्तों या परिवार से जुड़ने के लिए होता है, तो असर अपेक्षाकृत बेहतर होता है.

किन देशों में ज्यादा असर | Social Media Impact

दिलचस्प बात यह भी है कि यह गिरावट खासतौर पर अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे अंग्रेजी भाषी देशों में ज्यादा दिखी है. पिछले करीब दस साल में इन देशों के युवाओं की लाइफ सैटिस्फैक्शन कम हुई है, जबकि बाकी दुनिया के युवाओं में यह बढ़ी है. इस फर्क के पीछे सिर्फ सोशल मीडिया नहीं, बल्कि सोशल सपोर्ट भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है. जिन युवाओं को परिवार और समाज से कम सपोर्ट महसूस होता है, उनमें असंतोष ज्यादा देखा गया है.

इसी बीच कई देशों ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर सख्ती पर विचार शुरू कर दिया है. ऑस्ट्रेलिया तो 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने की दिशा में कदम भी उठा चुका है. पूरी तस्वीर यही बताती है कि मामला सिर्फ स्क्रीन टाइम का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि डिजिटल दुनिया में हम क्या और कैसे देख रहे हैं. क्योंकि वही धीरे-धीरे हमारी असली दुनिया के अनुभव और संतुष्टि को भी प्रभावित कर रहा है.

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