पेट से जुड़ी समस्या बन न जाए कोलोरेक्टल कैंसर की वजह, जान लीजिए टेस्ट कराने का समय

Colorectal Cancer: आजकल की बिगड़ती लाइफस्टाइल और असंतुलित खान-पान की वजह से पेट से जुड़ी समस्याएं बेहद आम हो गई हैं। हम अक्सर कब्ज, गैस या अपच जैसी तकलीफों को साधारण समझकर घरेलू नुस्खों या ओवर-द-काउंटर दवाइयों से दबाने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पेट और आंतों से जुड़ी लंबे समय की समस्याएं आगे चलकर कोलोरेक्टल कैंसर का रूप ले सकती हैं।
क्या कहते हैं IARC के अनुमान?
इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) के GLOBOCAN अनुमानों के मुताबिक, कोलोरेक्टल कैंसर दुनिया भर में तीसरा सबसे ज्यादा होने वाले कैंसर में से एक है। वहीं, कोलोरेक्टल कैंसर दुनिया में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। हर साल इसके लगभग 19.3 लाख नए मामले सामने आते हैं और लगभग 9.04 लाख लोगों की मौत होती है।
कोलोरेक्टल कैंसर के सबसे कॉमन लक्षणों में बिना दर्द वाली गांठ, पेट में ऐंठन जैसा दर्द, आंत में रुकावट, एनीमिया, मल में खून आना और बहुत ज्यादा थकान महसूस होना शामिल हैं। भूख कम लगना, पीलिया और हड्डियों में दर्द कैंसर भी कैंसर के कारण हैं।
शरीर में कैंसर होना साबित नहीं करता
ये लक्षण अन्य गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर, जैसे छोटी आंत के ट्यूमर और पेट के कैंसर से भी मिलते-जुलते हो सकते हैं। साथ ही, इन लक्षणों का होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि शरीर में कैंसर है। मगर, यदि ये लक्षण बार-बार दिखाई दें या 2 से 3 सप्ताह तक ठीक न हों, तो कोलोनोस्कोपी और बायोप्सी, मल में छिपे हुए ब्लड की जांच, नॉर्मल ब्लड टेस्च के जरिए पता लगाया जा सकता है।
कैसे लगाएं कैंसर का पता?
कैंसर का पता लगाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण जांच बायोप्सी है, जिसमें गांठ से टिशू का सैंपल लेकर जांच की जाती है। इस जांच से ही कैंसर का पता लगाने में मदद मिलती है। वहीं, सोसाइटी में ऐसी धारणा भी है कि बायोप्सी कराने से कैंसर फैल जाता है, जबकि यह पूरी तरह गलत है। इस गलतफहमी के कारण कई मामलों में डायग्नोसिस करने में देरी होती है, जिससे बीमारी के एडवांस चरण में नहीं पहुंच पाते और मौत का खतरा बढ़ जाता है।
अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देश के अनुसार, एक हेल्दी व्यक्ति को 45–50 वर्ष की उम्र में स्क्रीनिंग कोलोनोस्कोपी कराने की सलाह दी जाती है, जिसे हर 10 सालों में एक बार कराया जाना चाहिए। कोलोरेक्टल कैंसर जेनेटिक भी हो सकता है। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ सकता है। ऐसे परिवारों को कम उम्र से ही नियमित कोलोनोस्कोपी कराने की सलाह दी जाती है, ताकि बिना किसी लक्षण के भी शुरुआती स्टेज में कैंसर का पता लगाया जा सके।




