Epilepsy: सही इलाज और जागरूकता से साथ जीत सकते हैं मिर्गी के खिलाफ जंग


Epilepsy Awareness: हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मिर्गी दिवस (9 फ़रवरी) बीता है. इस मौके पर आयुष मंत्रालय ने मिर्गी के प्रति लोगों को जागरूक करने की खास अपील की है. मंत्रालय ने मिर्गी के बारे में फैली गलत धारणाओं और डर को खत्म करने की कोशिश की है. समाज को मिर्गी के मरीजों के साथ भेदभाव करने के बजाय उन्हें अपनाना चाहिए और उनकी मदद करनी चाहिए. इस पहल का मकसद लोगों को ये समझाना है कि मिर्गी कोई अभिशाप नहीं है, केवल एक दिमागी स्थिति है, जिसे सही इलाज से कंट्रोल किया जा सकता है.
न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है मिर्गी | Epilepsy Awareness
मिर्गी एक सामान्य न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है, जिसमें दौरे पड़ते हैं. इस दौरान पीड़ित व्यक्ति हाथ-पैर झटक सकता है, मुंह से झाग आ सकता है, और आंखें ऊपर की ओर चढ़ सकती हैं. अधिकांश मामलों में दवाओं और उचित इलाज से मिर्गी को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है. लेकिन, देश के कई हिस्सों में सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से यह समस्या और मुश्किल हो जाती है. कई लोग मिर्गी को बुरी आत्माओं का प्रभाव, पिछले जन्म के पाप या अलौकिक शक्तियों से जोड़ते हैं. इससे पीड़ित व्यक्ति को गलत उपचार, हानिकारक प्रथाओं और कलंक झेलना पड़ता है.
यही नहीं, मिर्गी शिक्षा, रोजगार, विवाह और सामाजिक जीवन पर बुरा असर डालती है. रोजगार के मामले में स्थिति बहुत चिंताजनक है. केरल के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि मिर्गी से पीड़ित 58 प्रतिशत लोग बेरोजगार थे, जबकि सामान्य लोगों में यह आंकड़ा सिर्फ 19 प्रतिशत तक था. कारणों में कार्यस्थल पर दौरे पड़ने से गिरना, अशिक्षा, एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं से थकान और बार-बार अनुपस्थिति शामिल है.
ऐसे लोगों को नौकरी लेने में होती है समस्या | Epilepsy Awareness
नियोक्ता अक्सर ऐसे लोगों को नौकरी देने से हिचकिचाते हैं. दौरे पड़ने पर सामाजिक कलंक बढ़ता है, जिससे व्यक्ति को कम वेतन वाली नौकरी या बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है. कई मामलों में नौकरी छूट जाती है. समय के साथ शिक्षा और सामाजिक स्तर में सुधार हुआ है, लेकिन मिर्गी के प्रति धारणा, कलंक और भेदभाव में खास बदलाव नहीं आया. इससे अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ती हैं.
इंडियन एपिलेप्सी एसोसिएशन क्या कहता है? | Epilepsy Awareness
इंडियन एपिलेप्सी एसोसिएशन के प्रयासों से भारतीय न्यायपालिका ने स्पष्ट किया है कि मिर्गी को मानसिक बीमारी नहीं माना जाना चाहिए. मिर्गी के कारण तलाक की प्रथा को हतोत्साहित किया जाना चाहिए. विशेषज्ञों का मानना है कि मिर्गी के बोझ को कम करने के लिए जागरूकता जरूरी है. इसमें बेहतर देखभाल, रोकथाम, जन जागरूकता अभियान और मौजूदा कार्यक्रमों में मरीजों की देखभाल को शामिल करना शामिल है.





